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Showing posts from October, 2017

गन्दगी सोंच में नहीं, गली में है |

                                गंदगी गली में है   दीपावली करीब है | लोग अपने-अपने घरों की साफ-सफाई कर रहे होंगे | क्यों न हम भी थोड़ी साफ-सफाई की बातें कर लें ! लोकतंत्र के 4 खम्भे होते हैं, उसी तरह किसी घर के भी चार खाने होते हैं ...बैठने का, सोने का, खाने का और चौथा जो अब इंट्रोडयुस हुआ है...हगने का | क्षमा करेंगे, पहले तो इस हग शब्द का नाम लेना भी टैबू था पर अब परिस्थिति बदली है | पहले जहाँ शौच की जगह दूर-दराज की झाड़ियों में होती थी अब न सिर्फ घर में है बल्कि हमारे बेडरूम में होती है और इसका महत्त्व ऐसा है की अगर आप के पास एक से अधिक बेडरूम हैं तो वो रूम मास्टर बेडरूम का दर्जा पाता है जिसमे टॉयलेट अटैच होता है |                                        ...

सोंच सर्वोच्च है |

सारा समुन्दर मछलियाँ खा रहा है पर अगर कोई अंत तक बचा रहनेवाला है तो वो मछलियाँ  हैं | जंगल के खूंखार बाघ-शेर हिरणों को खा-खाकर खुद ख़त्म हो गए और हिरण आज भी संकटापन्न नहीं हुए | ये नेचर का नियम है, "मारनेवाले मिट जाते हैं, खुद को बचानेवाले  ही बचे रह जाते हैं |" यही सहिष्णुता है | और ये जिसके साथ है वही बचा रह जायेगा | हिन्दुस्तानी संस्कृति सतत है ये कभी ख़त्म नहीं हुई | ये हजारों वर्षों से चलती आ रही है | "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा |" कुछ बात तो बिलकुल्ल है | यहाँ वैचारिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता है | यहाँ सोंच को सर्वोच्च माना जाता रहा है | हम द्वैत को भी पूजते हैं अद्वैत को भी | यहाँ चार्वाक को भी सुना जाता है और निम्बार्क को भी | यहाँ ईश्वर "एको अहम्, द्वितीयो नास्ति " कह सकता है तो करोड़ों मनुष्य भी उतने ही अधिकार से "अहम् ब्रह्मास्मि " कह सकते  हैं | यहाँ आप ईश्वर को माने बिना भी उतने ही धार्मिक हो सकते  हैं जितना ईश्वर को मानते हुए | क्योंकि ये हिंदुस्तान है, यहाँ सोंच सर्वोच्च है | लिबर्टी ...