सोंच सर्वोच्च है |
सारा समुन्दर मछलियाँ खा रहा है पर अगर कोई अंत तक बचा रहनेवाला है तो वो मछलियाँ हैं | जंगल के खूंखार बाघ-शेर हिरणों को खा-खाकर खुद ख़त्म हो गए और हिरण आज भी संकटापन्न नहीं हुए | ये नेचर का नियम है, "मारनेवाले मिट जाते हैं, खुद को बचानेवाले ही बचे रह जाते हैं |" यही सहिष्णुता है | और ये जिसके साथ है वही बचा रह जायेगा |
हिन्दुस्तानी संस्कृति सतत है ये कभी ख़त्म नहीं हुई | ये हजारों वर्षों से चलती आ रही है | "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा |" कुछ बात तो बिलकुल्ल है | यहाँ वैचारिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता है | यहाँ सोंच को सर्वोच्च माना जाता रहा है | हम द्वैत को भी पूजते हैं अद्वैत को भी | यहाँ चार्वाक को भी सुना जाता है और निम्बार्क को भी | यहाँ ईश्वर "एको अहम्, द्वितीयो नास्ति " कह सकता है तो करोड़ों मनुष्य भी उतने ही अधिकार से "अहम् ब्रह्मास्मि " कह सकते हैं | यहाँ आप ईश्वर को माने बिना भी उतने ही धार्मिक हो सकते हैं जितना ईश्वर को मानते हुए | क्योंकि ये हिंदुस्तान है, यहाँ सोंच सर्वोच्च है | लिबर्टी को मूर्ति बना के पूजनेवाले अमरीकन भी उस स्तर को प्राप्त नहीं कर पाए हैं जिस स्तर की वैचारिक स्वतंत्रता हिन्दुस्तानी पुरातन काल से लब्ध करते आये हैं |
आज दुनिया कुछ ऐसी विचारधाराओं से जूझ रही है जो सोंच को सर्वोच्च नहीं मानते | जो ईश्वर सर्वोच्च है कहते फिरते हैं | जो व्यक्ति की जगह अव्यक्त को प्राथमिकता देते हैं | जो ईश् के लिए शीश कुचलने में विश्वास करते हैं | आदमी की ये प्रवृत्ति आत्मघाती है | शीश से सोंच निकली है और सोंच से ईश्वर | ईश्वर एक संकल्पना है | "आप्त्वक अनुमानाभ्यम साध्वम त्वां प्रति का कथा ?" ईश्वर अप्रत्यक्ष है, पर ये तथ्य प्रत्यक्ष है की, बहुत से ऐसे लोग हैं जो ईश्वर को माने बिना भी अस्तित्व में हैं पर ऐसा कोई ईश्वर नहीं जो लोगों के माने बिना अस्तित्वमान रहा हो | इतिहास के पन्नों में देखिये, ऐसे ईश्वर भरे पड़े हैं जो अपने समय के सुप्रीम गॉड थे पर अब कोई उन्हें जानता तक नहीं |
हिंदुस्तान में जन्मा व्यक्ति इस बात के लिए गर्व कर सकता है को वो उस भूमि पर पैदा हुआ है, जहाँ तब से सोंच को सर्वोच्चता प्राप्त है, जब से इंसान पैदा हुआ है | हमें इस भूमि की संस्कृति को कायम रखना है | इसके लिए हमें उन विचारधाराओं पर चेक रखना होगा जो किसी ईश्वर या वाद के नाम पर सोंच की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए कुख्यात हों | उनसे निपटना होगा | इसके लिए मरने-मारने की जरुरत नहीं, बचने-बचाने की जरुरत है | क्योंकि याद है न ...."मारनेवाले मिट जायेंगे, खुद को बचानेवाले बचे रह जायेंगे | यही नेचर का नियम है |"
हिन्दुस्तानी संस्कृति सतत है ये कभी ख़त्म नहीं हुई | ये हजारों वर्षों से चलती आ रही है | "कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा |" कुछ बात तो बिलकुल्ल है | यहाँ वैचारिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता है | यहाँ सोंच को सर्वोच्च माना जाता रहा है | हम द्वैत को भी पूजते हैं अद्वैत को भी | यहाँ चार्वाक को भी सुना जाता है और निम्बार्क को भी | यहाँ ईश्वर "एको अहम्, द्वितीयो नास्ति " कह सकता है तो करोड़ों मनुष्य भी उतने ही अधिकार से "अहम् ब्रह्मास्मि " कह सकते हैं | यहाँ आप ईश्वर को माने बिना भी उतने ही धार्मिक हो सकते हैं जितना ईश्वर को मानते हुए | क्योंकि ये हिंदुस्तान है, यहाँ सोंच सर्वोच्च है | लिबर्टी को मूर्ति बना के पूजनेवाले अमरीकन भी उस स्तर को प्राप्त नहीं कर पाए हैं जिस स्तर की वैचारिक स्वतंत्रता हिन्दुस्तानी पुरातन काल से लब्ध करते आये हैं |
आज दुनिया कुछ ऐसी विचारधाराओं से जूझ रही है जो सोंच को सर्वोच्च नहीं मानते | जो ईश्वर सर्वोच्च है कहते फिरते हैं | जो व्यक्ति की जगह अव्यक्त को प्राथमिकता देते हैं | जो ईश् के लिए शीश कुचलने में विश्वास करते हैं | आदमी की ये प्रवृत्ति आत्मघाती है | शीश से सोंच निकली है और सोंच से ईश्वर | ईश्वर एक संकल्पना है | "आप्त्वक अनुमानाभ्यम साध्वम त्वां प्रति का कथा ?" ईश्वर अप्रत्यक्ष है, पर ये तथ्य प्रत्यक्ष है की, बहुत से ऐसे लोग हैं जो ईश्वर को माने बिना भी अस्तित्व में हैं पर ऐसा कोई ईश्वर नहीं जो लोगों के माने बिना अस्तित्वमान रहा हो | इतिहास के पन्नों में देखिये, ऐसे ईश्वर भरे पड़े हैं जो अपने समय के सुप्रीम गॉड थे पर अब कोई उन्हें जानता तक नहीं |
हिंदुस्तान में जन्मा व्यक्ति इस बात के लिए गर्व कर सकता है को वो उस भूमि पर पैदा हुआ है, जहाँ तब से सोंच को सर्वोच्चता प्राप्त है, जब से इंसान पैदा हुआ है | हमें इस भूमि की संस्कृति को कायम रखना है | इसके लिए हमें उन विचारधाराओं पर चेक रखना होगा जो किसी ईश्वर या वाद के नाम पर सोंच की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए कुख्यात हों | उनसे निपटना होगा | इसके लिए मरने-मारने की जरुरत नहीं, बचने-बचाने की जरुरत है | क्योंकि याद है न ...."मारनेवाले मिट जायेंगे, खुद को बचानेवाले बचे रह जायेंगे | यही नेचर का नियम है |"
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