हर घर में प्रद्युम्न है
एनिमल प्लेनेट का एक सीन है | 'नू' का एक बच्चा शेर के चंगुल में फंस गया | उस 'नू' के बच्चे को शेर चाट रहा था और बाकि के 'नू' अपने बच्चों को चाट रहे थे | पिछले दिनों दिल्ली से सटे गुडगाँव के एक नामी-गिरामी इंटरनेशनल स्कूल में वो हुआ जो किसी बर्बर से बर्बर संस्था में भी न हुआ होगा | आये दिन प्राइवेट स्कूलों के बंद गेट के अन्दर से तरह-तरह की हरकतें सुनने को मिलती हैं | पर ऐसा तो कभी नहीं हुआ | अब बच्चे को न्याय दो, दोषी को पकड़ो, जेल में डालो, फांसी लगा दो जैसी वही पुराने ढर्रेदार बातें सुनने को मिल रही हैं | कोई कहता है हत्यारा दोषी, कोई कहे स्कूल | अब ये तो पुलिस बताएगी | मेरा कहना बड़ा साधारण है | भले हत्या किसी ने की हो, स्कूल कोई हो, प्रबंधन किसी का हो | समाज तो आपका है और ये सब समाज के अन्दर हुआ है तो जिम्मेदार आप भी हैं | और जिम्मेदारी इंडिया गेट पर कैंडल ले के घुमने और जंतर-मंतर पर दरी बिछाकर बैठने से तो ख़त्म नहीं होती | सरकार को घेरने से, रजनीतिक दलों पर राजनीति करने के आरोप लगाने से भी ख़त्म नहीं होती, जिम्मेदारी तो जिम्मा पूरा करने से ही ख़त्म होती है | अपराधी अपराध के नित नए कीर्तिमान बना रहे हैं और हमलोग .....हमलोग विरोध के उसी पुराने ढर्रे पर हैं |
हत्यारे को पकड़ने से हत्या नहीं रुकेगी, हत्या को रोकने से हत्या रुकेगी | अपराधी अपराध करने से पहले चिन्हित हो जाए वो सिस्टम बनेगा, वो परिस्थिति बनेगी, तो हत्या रुकेगी | इसके लिए पारदर्शिता चाहिए | निजी संस्थानों के गेट के अन्दर झाँका जा सके वो पारदर्शिता | संविधान कहता है, की देश का नागरिक देश के किसी भी हिस्से में जा सकता है, पर कोई डेरा, कोई स्कूल, कोई संस्था 100 एकड़...200 एकड़ जमीन खरीदकर घेर ले और उसके अन्दर कुछ भी करता रहे, कोई देखना चाहे तो देख नहीं सकता, जानना चाहे तो जान नहीं सकता , जाना चाहे तो अन्दर जा नहीं सकता | निजता का अधिकार है | पुलिस भी अन्दर जाने के लिए सर्च वारंट ढूंढती रह जाती है | कुछ संस्थाएं इसी का फायदा उठा रही हैं |
प्रजातंत्र में, स्कूल प्रबंधन प्रजातान्त्रिक क्यों नहीं ? निजी स्कूल पेरेंट्स से फी की मोटी रकम लेते हैं तो स्कूल की टीचिंग, फैसिलिटी, और सुरक्षा ऑडिट का हक, पेरेंट्स को क्यों नहीं | मेरी सूझ मैंने लिख दी | आप तो मुझसे बेहतर सुझा सकते हैं | तो सोंचिये, सुझाइए और कार्यान्वित कराइये | हर घर में प्रद्युम्न है पर क्या आप चाहेंगे की हर घर में प्रद्युम्न के पिता जैसा भी कोई हो |(जिसने अपने होने की वजह खो दी |) नहीं न ! तो 'नू' मत बनिए | अब आगे ऐसा न हो वो उपाय रचिए |
प्रजातंत्र में, स्कूल प्रबंधन प्रजातान्त्रिक क्यों नहीं ? निजी स्कूल पेरेंट्स से फी की मोटी रकम लेते हैं तो स्कूल की टीचिंग, फैसिलिटी, और सुरक्षा ऑडिट का हक, पेरेंट्स को क्यों नहीं | मेरी सूझ मैंने लिख दी | आप तो मुझसे बेहतर सुझा सकते हैं | तो सोंचिये, सुझाइए और कार्यान्वित कराइये | हर घर में प्रद्युम्न है पर क्या आप चाहेंगे की हर घर में प्रद्युम्न के पिता जैसा भी कोई हो |(जिसने अपने होने की वजह खो दी |) नहीं न ! तो 'नू' मत बनिए | अब आगे ऐसा न हो वो उपाय रचिए |
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