गन्दगी सोंच में नहीं, गली में है |
गंदगी गली में है
दीपावली करीब है | लोग अपने-अपने घरों की साफ-सफाई कर
रहे होंगे | क्यों न हम भी थोड़ी साफ-सफाई की बातें कर लें ! लोकतंत्र के 4 खम्भे होते
हैं, उसी तरह किसी घर के भी चार खाने होते हैं ...बैठने का, सोने का, खाने का और
चौथा जो अब इंट्रोडयुस हुआ है...हगने का | क्षमा करेंगे, पहले तो इस हग शब्द का
नाम लेना भी टैबू था पर अब परिस्थिति बदली है | पहले जहाँ शौच की जगह दूर-दराज की
झाड़ियों में होती थी अब न सिर्फ घर में है बल्कि हमारे बेडरूम में होती है और इसका
महत्त्व ऐसा है की अगर आप के पास एक से अधिक बेडरूम हैं तो वो रूम मास्टर बेडरूम
का दर्जा पाता है जिसमे टॉयलेट अटैच होता है | स्वच्छता के मामले में घर की स्थिति
तो ठीक है पर वही सफाईपसंद लोग बाहर में न जाने क्यों बदल जाते हैं | इस ट्रेंड को
बदलने के खूब प्रयास हुए | अभी तो पूरा एक अभियान चला है जागरूकता फैलाने का,
पब्लिक को जगाने का...‘स्वच्छ भारत अभियान’ | हालाँकि ये बात दीगर है की सोयी पब्लिक
ज्यादा स्वच्छ रहती है, मतलब कम कचड़े फैलाती है | कचड़ा तो जागने के बाद फैलता है
जब घर के ‘सुसभ्य श्री’ अपने घर का कूड़ा पौलिथिन की थैलियों में भरकर बालकनी से,
छत पर, और कोई-कोई तो खिड़की से ही पोजीशन ले लेते हैं और किसी ओलिंपिक चैंपियन
डिस्कस थ्रोअर की तरह घुमा के फेंक देते हैं | फेंकते समय उनका एक ही उद्देश्य
होता है..बस साली ये कूड़े की थैली, मेरे घर से बाहर चली जाए, कहीं भी, नाले में,
रोड पर, किसी के छत पर या कहीं नहीं तो बाजु की गली में | किसी ने कहा है की गंदगी
सोंच में होती है, घर में नहीं | पर मैं तो कहता हूँ की गंदगी न घर में होती है न
सोंच में | गंदगी तो गली में होती है | यकीन नहीं तो अपने से पूछिये, क्या मैं
साफ-सफाई पसंद हूँ ? जवाब मिलेगा ‘बिलकुल्ल’ सोलह आने ब्रो | फिर अपने घर को
देखिये, चकाचक है न ? जरुर होगा, 100 परसेंट | अब थोड़ा बाहर बाजू वाली गली में
झांकिए | झांकिए.... | क्यों, हो गया न पलीता ! है न खूब लीचड़-कीचड़ | तो इस गली की
गंदगी को मिटाना होगा, उस सोंच को मिटाना होगा, जो अपने घर को साफ और गली को गन्दा
करने की नियत रखती है| इस दिशा में प्रयास भी हो रहे हैं | गली और रोड को
थूकाड़ियों, मूताड़ियों, हगाड़ियों और डिस्कस थ्रोअरों से बचाने के वास्ते चाहरदीवारी
पर स्लोगन लिखे जा रहे हैं | अभी हाल में मैं ऐसा ही एक वाल देखने गया
जिसपर कुछ रोज पहले स्लोगन लिखे गए थे | अब क्या कहूँ जी, दंग रह गया देखकर | पान,
गुटखा, खैनी, तम्बाकू खानेवालों ने इस कदर थूका था की अब वे अर्थ के उल्टे अनर्थ
उगल रहे थे | “यहाँ न थूकें” थूक में पुत कर “यहाँ थूकें” बन गया था | “यहाँ थूकना
मना है” “यहाँ थूकना है” का सन्देश दे रहा था और सबसे दिलचस्प हश्र तो तीसरे
स्लोगन का हुआ था | “यहाँ थूकना मनाही है अन्यथा पकड़े जाने पर 500 rs जुर्माना |” ये
वाक्य थूक में लिपटकर क्या खूब कटुपहासिक बन गया था,...“यहाँ थूकना ही है अन्यथा
पकड़े जाने पर 500 rs जुर्माना | धन्य है कचड़ा करनवालों की निगेटिव स्टेटमेंट को
पॉजिटिव में बदलने की शक्ति | जब स्लोगन से बात न बनी
तो फिर गली-सड़कों को बचाने के लिए भगवान की भी मदद ली गयी | उन्हें पोस्टर रूप में
अवतरित करा वहां तैनात किया गया | हर उस कोने पर उनके पोस्टर चस्पा कर दिए गए जहाँ
लीचड़ लोग कीचड़ कर रहे थे | पर सुना है थूकाड़ियों और मूताड़ियों ने उन्हें भी नहीं
बख्शा | बेचारे भगवन भी लाल-पीले मुंह के साथ बैक टू पवेलियन हो गए | अब तो ‘भगवान्
बचाए’ भी नहीं बोल सकते | अब हमसभी को ही कुछ करना होगा | आइये अब कुछ
ऐसा किया जाए की सार्वजनिक स्थानों को, गली..रोड..मोहल्लों को, साफ रखनेवाली
मानसिकता विकसित हो | क्योंकि गंदगी न तो सोंच में है न घर में, गंदगी तो गली में
है, ठीक हमारे बाजूवाली गली में | और एक कमाल की बात देखिये की ये गंदगी सिर्फ
हमारे कारण ही है क्योंकि जहाँ हम नहीं हैं वहां गंदगी भी नहीं है | “वो जगह कितनी
स्वच्छ होती है जहाँ आदमी नहीं रहता |” क्या हम इस कटु सत्य को उलटकर ऐसा नहीं बना
सकते की प्रकृति कहे...”वो जगह कितनी स्वच्छ होती है जहाँ आदमी रहता है !” - Sunil Kumar ‘Idiocratic’
बढ़िया
ReplyDeleteबढ़िया
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